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क्या महिलाओं का सशक्तिकरण सिर्फ चुनावी जुमला बनकर रह गया है ? या कभी सच में उन्हें बराबरी का हक मिलेगा ?- मनोज यादव

क्या महिलाओं का सशक्तिकरण सिर्फ चुनावी जुमला बनकर रह गया है ? या कभी सच में उन्हें बराबरी का हक मिलेगा ?- मनोज यादव

भोपाल(राहुल अग्रवाल)-22/4/26

महिला आरक्षण बिल 2023, जिसे संविधान का 106वां संशोधन कहा जाता है, देश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह बिल 19 सितंबर 2023 को लोकसभा में पेश हुआ, 20 सितंबर को 454 वोटों के भारी बहुमत से पास हुआ, जबकि सिर्फ 2 वोट इसके खिलाफ पड़े। इसके बाद 21 सितंबर 2023 को राज्यसभा में भी यह सर्वसम्मति से पारित हुआ और 28 सितंबर 2023 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इस पर हस्ताक्षर कर इसे कानून बना दिया।

 

देश में एक “चौथी पास राजा” बैठा है—बातें ऐसी करता है जैसे महिलाओं का भाग्य बदल देगा, लेकिन जब हकीकत की बारी आती है तो तस्वीर बिल्कुल उलट दिखती है। 33% आरक्षण के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, मगर 2024 के लोकसभा चुनाव में इसे लागू करने का मौका था, तब यह वादा ज़मीन पर उतरता नजर नहीं आया।

 

आंकड़े खुद सच बोलते हैं—टीएमसी के पास 11 महिला सांसद हैं, जो लगभग 38% हिस्सेदारी दिखाता है, जबकि समाजवादी पार्टी के पास 5 महिला सांसद हैं, जो करीब 13.5% के साथ देश में दूसरे नंबर पर आती है। लेकिन जो सबसे ज्यादा नारे लगाता है, उसकी अपनी पार्टी में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 13% के आसपास ही सिमटी हुई है।

 

और बात यहीं खत्म नहीं होती—जिस विचारधारा की दुहाई दी जाती है, उसी के सबसे बड़े संगठन में महिलाओं की भूमिका लगभग नदारद है। यानी मंच से नारी शक्ति की जय-जयकार, और संगठन में उनके लिए जगह नहीं! यह पूरा मामला ऐसा लगता है जैसे भाषणों में “सम्मान” और हकीकत में “सिर्फ इस्तेमाल”। सवाल सीधा है—क्या महिलाओं का सशक्तिकरण सिर्फ चुनावी जुमला बनकर रह गया है, या कभी सच में उन्हें बराबरी का हक मिलेगा?

 

समाजवादी पार्टी, स्पष्ट करना चाहती है कि उसने इस बिल का समर्थन किया था और हमेशा महिलाओं के अधिकारों और उनकी राजनीतिक भागीदारी के पक्ष में रही है। संसद की वोटिंग इसका सीधा प्रमाण है। इसलिए यह कहना कि विपक्ष या समाजवादी पार्टी महिला आरक्षण के खिलाफ है, पूरी तरह भ्रामक और तथ्यहीन है।

 

समाजवादी पार्टी का स्पष्ट मत है कि महिलाओं को आरक्षण तुरंत मिलना चाहिए। हमारी मांग रही है कि मौजूदा लोकसभा की 543 सीटों और राज्यों की विधानसभा सीटों में ही एक-तिहाई आरक्षण लागू किया जाए, ताकि बिना देरी के महिलाओं को उनका हक मिल सके। लेकिन केंद्र सरकार ने इसको जनगणना और परिसीमन से जोड़कर टालने का काम किया है।

 

हम यह भी कहना चाहते हैं कि हाल के समय में परिसीमन से जुड़े मुद्दों को महिला आरक्षण से जोड़कर जनता के बीच भ्रम फैलाया जा रहा है। समाजवादी पार्टी का मानना है कि परिसीमन की प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष होनी चाहिए, लेकिन जिस तरह से दक्षिण भारत के राज्यों को लेकर आशंकाएं सामने आ रही हैं, वह चिंता का विषय है। जो राज्य विकास और जनसंख्या नियंत्रण में आगे रहे हैं, उनके साथ किसी भी प्रकार का असंतुलन नहीं होना चाहिए।

 

मध्य प्रदेश में भाजपा द्वारा महिला आरक्षण को लेकर निकाली गई रैली पर भी समाजवादी पार्टी सवाल उठाती है। अगर सरकार वास्तव में महिलाओं को अधिकार देना चाहती, तो यह कानून 2023 से ही लागू किया जा सकता था और 2024 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण मिल सकता था।

 

समाजवादी पार्टी का मानना है कि महिलाओं का सम्मान केवल नारों और रैलियों से नहीं, बल्कि ठोस फैसलों और समय पर लागू की गई नीतियों से होता है। हम महिला आरक्षण के समर्थन में हैं, लेकिन दिखावटी राजनीति और भ्रम फैलाने के खिलाफ हैं।

 

मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार की गेहूं खरीदी व्यवस्था पर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं। पहले बारदाने की कमी का हवाला देकर खरीदी की तारीखें बार-बार आगे बढ़ाई गईं, और जब किसी तरह खरीदी शुरू हुई तो ई-उपार्जन सॉफ्टवेयर में कैपिंग लागू कर दी गई। इस फैसले के तहत सिर्फ दो हेक्टेयर तक जमीन वाले किसानों का गेहूं खरीदा जा रहा है, जबकि बड़े किसान स्लॉट ही बुक नहीं कर पा रहे। इतना ही नहीं, एक खरीदी केंद्र पर 1000 क्विंटल की सीमा तय कर दी गई, जो पिछले साल नहीं थी। डबल वेरिफिकेशन जैसी जटिल प्रक्रिया ने भी किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं, जिससे उन्हें अपनी ही फसल बेचने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

 

वहीं दूसरी ओर, सरकार के दावे और हकीकत में बड़ा अंतर साफ नजर आ रहा है। 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने घोषणा की थी कि किसानों का गेहूं 2700 रुपये प्रति क्विंटल के समर्थन मूल्य पर खरीदा जाएगा, लेकिन आज किसान 2000 से 2200 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर अपनी उपज बेचने को मजबूर हैं। मार्च से अब तक प्रदेशभर की मंडियों में करीब 20 लाख टन गेहूं व्यापारियों को समर्थन मूल्य से कम कीमत पर बेचा जा चुका है। सरकार अब दोबारा सर्वे की बात कर रही है, जबकि फसल पहले ही कट चुकी है—ऐसे में यह सर्वे कितना व्यावहारिक होगा, यह बड़ा सवाल है। कुल मिलाकर, बार-बार बदलते नियम और अधूरी वादाखिलाफी किसानों को राहत देने के बजाय उन्हें और ज्यादा परेशान करती नजर आ रही है।

 

छतरपुर जिले के धौड़न गांव में केन–बेतवा लिंक परियोजना के विरोध में आदिवासी किसान और महिलाएं जिस तरह सड़कों पर उतरे, वह सिर्फ एक आंदोलन नहीं बल्कि अपनी जमीन और अस्तित्व बचाने की पुकार है। 40–42 डिग्री की भीषण गर्मी में 12 दिनों तक “पंचतत्व सत्याग्रह” और “चिता आंदोलन” करना, गले में फंदा डालकर प्रदर्शन करना—यह दिखाता है कि हालात कितने गंभीर हैं। जानकारी के मुताबिक इस परियोजना से बुंदेलखंड क्षेत्र के दर्जनों गांव प्रभावित हो रहे हैं और कई गांवों पर विस्थापन का सीधा खतरा मंडरा रहा है। इन ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें न तो पर्याप्त मुआवजा मिल रहा है और न ही स्पष्ट पुनर्वास की व्यवस्था दी जा रही है, जिसके कारण वे अपने ही घर-गांव में असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

 

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