यमुना एक्सप्रेसवे एक्सीडेंट वाले बस मालिक का 6 राज्यों से कनेक्शन, ठिकाना एमपी-यूपी के बॉर्डर पर
बस माफियाओं के खिलाफ सेंट्रलाइज्ड ऑपरेशन टीम की जरूरत

यमुना एक्सप्रेसवे एक्सीडेंट वाले बस मालिक का 6 राज्यों से कनेक्शन, ठिकाना एमपी-यूपी के बॉर्डर पर
नई दिल्ली/भोपाल(राहुल अग्रवाल), 24 सितंबर 2026:
यमुना एक्सप्रेसवे पर हुए बस एक्सीडेंट में जो यात्रियों की जिंदा जल जाने से मौत के बाद बस के मालिक की पूरी कुंडली बाहर आने लगी है। सरकारी डॉक्यूमेंट में इसका ठिकाना एमपी यूपी के बॉर्डर पर छतरपुर में बताया गया है लेकिन यह दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश में सक्रिय है और बिहार से भी इसका पक्का कनेक्शन है।
यमुना एक्सप्रेस वे पर जिस बस में आग लगी वह बिहार की थी। बस का रजिस्ट्रेशन बिहार का है। यह बस दिल्ली से उत्तर प्रदेश के महोबा जा रही थी। बस का फिटनेस सर्टिफिकेट राजस्थान से और पॉल्यूशन सर्टिफिकेट हरियाणा से जारी किया गया था। ट्रैवल एजेंसी (राज कल्पना ट्रैवल्स) का ऑफिस मध्य प्रदेश के छतरपुर में है। मतलब ऐसा जाल बिछाया गया है कि कोई भी एक राज्य का परिवहन विभाग सामान्य तौर पर इसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करता। सड़क पर चलती हुई बस में आग लगा फिटनेस का विषय है, जो राजस्थान से जारी हुआ लेकिन बस राजस्थान में चलती ही नहीं थी तो राजस्थान की सरकार फिटनेस सर्टिफिकेट जारी करने के बाद बस को कभी दोबारा चेक ही नहीं कर पाई। हरियाणा से पॉल्यूशन सर्टिफिकेट लेकर बस दिल्ली से महोबा उत्तर प्रदेश के रूट पर चलती थी, और मध्य प्रदेश में तो केवल ऑफिस था।
यमुना एक्सप्रेसवे हादसे वाली बस में क्या-क्या कमियां थी?
फायर ऑफिसर प्रदीप कुमार और ADM के अनुसार शुरुआती कारण एसी सिस्टम में स्पार्क/शॉर्ट सर्किट था। उससे इंजन का लुब्रिकेंट ऑयल जल गया और लपटें तेजी से फैल गईं।
बस के अंदर आग को बुझाने के लिए कोई फायर सिस्टम नहीं था।
काँच तोड़ने वाले हैमर और काम का फायर अलार्म नदारद था।
छत पर सामान इसलिए आग ऊपर भी फैली।
यात्रियों ने आग से पहले ड्राइवर केबिन से जलने की बदबू महसूस की थी। यानी खराबी अचानक नहीं, पहले संकेत दे चुकी थी। फायर एक्सटिंग्विशर इस्तेमाल करने की कोशिश हुई, काम नहीं किया।
सबसे घातक संरचनात्मक कमी यही है। प्रारंभिक जाँच में पाया गया कि इमरजेंसी एग्जिट के ऊपर स्लीपर बर्थ बना दी गई थी, इसलिए वह EXIT बेकार हो गया। एक भी यात्री इमरजेंसी दरवाजे से बाहर नहीं निकल पाया। जबकि AIS-052/AIS-119 के अनुसार स्लीपर बस में कम से कम चार इमरजेंसी एग्जिट (दरवाजा + छत के हैच + खिड़कियाँ) होने चाहिए। थोड़ी सी कमाई के लिए यात्रियों की जान खतरे में डाल दी।

संकरा गलियारा, ऊपर-नीचे बर्थ और कम ऊँचाई के कारण रात में सोए यात्री भाग नहीं सके। कई लोगों ने खिड़की तोड़कर या कूदकर जान बचाई; अंदर फँसे लोग जलकर या धुएँ से मरे।
सामान डिब्बे में पेंट थिनर मिला। यह ज्वलनशील तरल पदार्थ है। जिसके कारण आग और भड़क गई।
यात्रियों ने बार-बार कहा—“भैया, कुछ जल रहा है।” चालक-कंडक्टर केबिन में बीड़ी/सिगरेट पीते रहे। बस नहीं रोकी।
आग फैलने के बाद चालक-कंडक्टर मौके से भाग गए।
दो ड्राइवर (पवन कुमार, योगेश दीक्षित) और कंडक्टर (रोहित) तीनों कानपुर के रहने वाले हैं।
जनवरी में इस बस को चलने वाला ड्राइवर नाबालिग था
इस बस के खिलाफ पहले से 19 चालान पेंडिंग है, करीब 1.75 लाख बकाया है। बस पहले से “चेतावनी वाली” थी, फिर भी चली:
जनवरी 2026: नाबालिग चालक से बस चलवाना
जून 2025: फ्यूल चेंज और रेट्रोफिटिंग नियमों का उल्लंघन
19 अगस्त: बिना परमिट — ₹15,000
7 अप्रैल: एक्सप्रेसवे पर ओवरस्पीड, बिना लाइसेंस, बिना यूनिफॉर्म — ₹6,900
अन्य तारीखों पर ₹12,000, ₹10,500, ₹10,000 आदि
परमिट संबंधी उल्लंघन अलग से।
बकाया भरने या बस रोकने की व्यवस्था काम नहीं आई।
इस बस पर विशेष रूप से और स्लीपर मॉडल पर आम तौर पर ये बातें दोहराई गई हैं: जुगाड़ बॉडी, घटिया वायरिंग और ज्वलनशील फोम/इंटीरियर ।
बस माफियाओं के खिलाफ सेंट्रलाइज्ड ऑपरेशन टीम की जरूरत
दरअसल बस माफिया, कानून का फायदा उठा रहे हैं। यात्री परिवहन राज्य सरकार का विषय है, इसलिए केंद्र सरकार कोई केंद्रीय कार्रवाई नहीं कर पाती। माफिया बड़ी चतुराई के साथ बस का रजिस्ट्रेशन, फिटनेस, पॉल्यूशन इत्यादि सर्टिफिकेट उन राज्यों से जारी करवाते हैं जहां उनके लिए आसान होता है। इस प्रकार सभी राज्यों की सरकारों की आंख में धूल झोंकते हुए बड़ी आसानी से, अपने मुनाफे के लिए यात्रियों की जान खतरे में डालकर कारोबार करते हैं और कई बार अवैध यात्री परिवहन भी करते हैं। इनको रोकने के लिए एक सेंट्रलाइज्ड ऑपरेशन टीम की जरूरत है।




