
वकणकर स्मृति दिवस विरासत और नई तकनीक : मदन कुमार
भोपाल(राहुल अग्रवाल)-3/4/26
प्रदेश की हजारों–लाखों वर्ष पुरानी स्मृतियों को यदि भौतिक रूप में सुरक्षित रखना है और अब तक हुई क्षति को न्यूनतम संभव स्तर तक लाना है, तो इस क्षेत्र में स्टार्टअप्स को इंक्यूबेशन सेंटर्स स्थापित कर प्रोत्साहित करना समय की माँग है।यह बात आयुक्त, पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय मदन कुमार ने , डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर पुरातत्व शोध संस्थान के द्वारा पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर की पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में आयोजित व्याख्यानमाला में कही। मदन कुमार ने संस्थान में इंक्युवेशन सेंटर की स्थापना में उपस्थित लोगों से नवोन्मेषी विचारों को प्रेषित कर भागीदारी करने का आव्हान किया ।
कार्यक्रम का प्रारंभ दीप प्रज्वलन व मां सरस्वती प्रतिमा एवं वाकणकर जी के चित्र पर अतिथियों द्वारा माल्यपर्ण किया गया। अतिथियों के रुप में नारायण व्यास, कैलाश चंद्र पाण्डे (मंदसौर), डॉ. मनोज कुमार कुर्मी (अधीक्षण पुरातत्वविद्, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण), डॉ. सुरेश कुमार दुबे (झांसी) मंचासीन रहे। व्याख्यान में पद्मश्री डॉ. नारायण व्यास एवं कैलाश चंद्र पाण्डे ने पुरातत्व के क्षेत्र में डॉ. वाकणकर जी के योगदान को रेखांकित किया ।
कैलाश चंद्र पाण्डे ने अपने व्याख्यान में मंदसौर एवं नीमच जिलों के पुरातत्व पर प्रकाश डालते हुये अवगत कराया कि पुरातत्व एवं इतिहास के क्षेत्र में उनकी रुचि पद्मश्री वाकणकर जी के शिष्यत्व में रहकर गहन हुई और दंगवाडा, रुनिजा, मंदसौर का उत्खनन कार्य और मालवा क्षेत्र के जिलों का गहन पुरातत्वविक सर्वेक्षण कार्यों में वाकणकर जी के सहभागी रहे ।
उन्होंने बताया कि मंदसौर जिले में स्थित छिब्बर नाला. दरकी चट्टान, चतुर्भज नाला के शैलचित्रों को प्रकाश में लाने का श्रेय वाकणकर जी को है। पद्मश्री वाकणकर जी के समक्ष आयी चुनौतियों एवं समाधान प्रयासों का उल्लेख श्री पाण्डे जी ने किया ।
डॉ. नारायण व्यास ने अपने व्याख्यान में डॉ वाकणकर जी का उल्लेख करते हुये बताया कि वस्तुतः वाकणकर जी के कारण ही उन्होंने पुरातत्व में उच्च शिक्षा प्राप्त कर खोज और उत्खनन के कार्य किये। उन्होंने अनेक पुरानी यादें ताजा करते हुए बताया कि अपने काम में वाकणकर जी इतने मग्न रहते कि पुरातत्वीय स्थलों की खोज करने एवं अपने शिष्यों का मार्गदर्शन स्वंय के साधनों से करने में भी नहीं चूकते थे। वाकणकर जी द्वारा अपने नागपुर यात्रा के दौरान सन् 23 मार्च 1957 को अपनी यात्रा स्थगित कर भीमबैटका के शैलचित्रों की खोज की गयी जिसे कालंतर में विश्वधरोहर घोषित किया गया। इसी खोज के आधार पर उन्हें भारत सरकार से 1975 में पद्मश्री सम्मान मिला।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में आयुक्त पुरातत्व द्वारा प्रदेश की पुरासंपदा को रेखांकित करते हुये डिंडौरी एवं उमरिया जिलों की शैलगुहओं मटकें वाला पत्थर, डाईनासौर के जीवाष्म एवं घुघुआ फॉसिल पार्क का उल्लेख किया गया। अपने उद्बोधन में द मोनूमेंट मन फिल्म के ट्रैलर के माध्यम से फिल्म के नायकों जैसे पुरातत्व के प्रति जागरुकता लाने पर जोर दिया। यह भी अवगत कराया गया कि यूनेस्को द्वारा ए.आर वी.आर प्रोजेक्ट चालू किया गया। आधुनिक परिवेश में प्रदेश की पुरावशेषों एवं संस्कृतिक धरोहरों को प्रकाश में लाने एवं उनके प्रति जनजागृति लाने तथा अध्ययन के लिये विभिन्न योजना तैयार कर डॉ. वाकणकर शोध संस्थान को नोडल संस्थान के रुप में विकसित करने एवं शोध कार्यों को बढ़ावा देने के मंतव्य से अवगत कराया।
इस अवसर पर आयुक्त पुरातत्व द्वारा डॉ. नारायण व्यास को पद्मश्री प्राप्त होने पर एवं कैलाशचंद्र पाण्डे को पुरातत्व के क्षेत्र में दिये गये योगदान हेतु सम्मानित किया गया । श्री वाकणकर जी की शिष्य परम्परा में राजेन्द्र नागदेव जी, डॉ. रेखा भटनागर व अन्य विद्वानो का सम्मान किया गया। साथ ही कला समय पत्रिका विशेषांक का विमोचन भी अतिथियों द्वारा किया गया ।
इस अवसर पर पुरातत्व विभाग के अधिकारी एवं कर्मचारी, टेमपल सर्वे भोपाल की सुश्री एम. विक्रम, अधीक्षण पुरातत्वविद् व अधिकारी ए.एस.आई. भौपाल, डॉ. रमेश यादव पुरातत्वविद् तथा कैरियर कॉलेज, सरोजनी नायडू कॉलेज, एम.एल.बी. कॉलेज के प्राध्यापक एंव छात्र उपस्थित रहें।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. धुवेन्द्र सिंह जोधा शोध अधिकारी, अतिथियों का स्वागत नीलेश लोखंडे उपसंचालक संग्रहालय एवं आभार संतोष नामदेव सहायक यंत्री द्वारा व्यक्त किया गया ।




