पुरुष प्रधान देश में बेटी ने निभाई बेटे की जिम्मेदारी,पिता को मुखाग्नि देकर बेटी बनी समानता की प्रतीक

पुरुष प्रधान देश में बेटी ने निभाई बेटे की जिम्मेदारी,पिता को मुखाग्नि देकर बेटी बनी समानता की प्रतीक
संस्कारों की बेटियाँ: जब टीना और मयूरी ने निभाया कर्तव्य और करुणा का धर्म
अलग व्यक्तिव के धनी थे स्वर्गीय अनिल अग्रवाल (मुन्ना भैया)
अग्रवाल समाज का बेटियों ने बढ़ाया मान
भोपाल(राहुल अग्रवाल)–3/1/2026
भैरुंदा (नसरुल्लागंज)में शनिवार का दिन गहरा सन्नाटा लेकर आया। अग्रवाल परिवार के मुखिया स्वर्गीय अनिल अग्रवाल(मुन्ना भैया)के निधन ने पूरे परिवार को शोक में डुबो दिया। किंतु उसी शोक की घड़ी में उनकी बेटियों – टीना और मयूरी अग्रवाल – ने ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन गया।

पिता के अंतिम संस्कार में जब मुखाग्नि देने का समय आया, तो बेटियों में बड़ी टीना अग्रवाल ने अपने पिता को अग्नि दी। आँसुओं से भीगे नेत्रों में दृढ़ता थी, और काँपते हाथों में वो संस्कार जो पिता ने ही सिखाए थे। उस क्षण में टीना ने न केवल एक पुत्री का कर्तव्य निभाया, बल्कि समाज के उन पुराने बंधनों को भी तोड़ दिया जो आज तक बेटों को ही अंतिम संस्कार का अधिकारी मानते आए थे।
मयूरी ने थामा मां का हाथ
वहीं घर पर, छोटी बहन मयूरी अग्रवाल ने माँ का हाथ थामे रखा। माँ की बिखरती भावनाओं को समेटते हुए, उसने अपने आँसुओं को पीछे रख दिया ताकि माँ को संभाल सके। उस क्षण उसने यह सिखाया कि हर कंधा सिर्फ श्मशान तक नहीं जाता, कोई कंधा घर में बैठकर भी परिवार को सहारा देता है।
इन दो बहनों ने उस दिन दो दिशाओं में खड़ी होकर एक ही धर्म निभाया — कर्तव्य और संवेदना का धर्म। टीना ने पिता के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई, और मयूरी ने माँ के प्रति। दोनों ने यह संदेश दिया कि बेटियाँ सिर्फ घर को उजाला नहीं देतीं, वे कठिनतम समय में भी परिवार की रीढ़ बन जाती हैं।
भैरुंदा की यह घटना समाज के लिए एक आईना है। यह दिखाती है कि अब संस्कारों की परिभाषा बदल रही है — जहाँ बेटी होना कोई बाधा नहीं, बल्कि गर्व का प्रतीक है। टीना और मयूरी ने अपने आचरण से सिद्ध किया कि संतान का धर्म लिंग नहीं पहचानता, वह केवल जिम्मेदारी पहचानता है।
अलग ही पहचान थी मुन्ना भैया की
भेरूंदा(नसरुल्लागंज) में स्वर्गीय अनिल अग्रवाल (मुन्ना भैया) की पूरे क्षेत्र में एक अलग ही पहचान थी।हर जरूरतमंद की मदद के लिए हमेशा तत्पर दिखाई देते थे मुन्ना भैया।फिर चाहे आर्थिक मदद करना हो या फिर स्वयं की उपस्थिति की बात,किसी भी समय तैयार रहने वाले व्यक्तिव के धनी थे मुन्ना भैया,जो एक अमिट छाप छोड़ कर दुनिया को अलविदा कह गए।एक ऐसी शख्सियत जो हमेशा यादों में जीवंत रहेंगे।




